अनजान वक़्त.

ये घडी रूकती क्यों नहीं? क्या ये कभी थकती नहीं है? क्यों ये हमेशा हमे समय बतलाती है? सुबह से लेके शाम ये किसी मुसाफिर की तरह चलती रहती हैं.

ये कांटे किसकी तलाश में गुम हैं. क्यों है इसका वक़्त हर चीज़ो से अनजान. नहीं है इसको किसी की परवाह ,जीवन-मृत्यु से ये रहती है अनजान.

हर युग, हर काल, हर साल रोके न रुके किसी हाल.. मैं कहूं ज़रा रुक जा, संभल जा तू थक गयी होगी..वो कहे ईश्वर का दिल हूँ किसी के कहने से ना रुकू.

किया इसने मुझे हैरान बता के अपनी पहचान की नहीं है ये किसी भी बात से अनजान.

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